हर साल की तरह इस बार भी 1 फरवरी को देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में केंद्रीय बजट पेश किया। यह बजट ऐसे समय में आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। एक ओर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों से वैश्विक व्यापार प्रभावित है, वहीं दूसरी ओर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी तकनीकें पूरी दुनिया के रोजगार और सप्लाई चेन को बदल रही हैं।
बजट भाषण सुनने पर ऐसा लगता है मानो भारत एक बड़े आर्थिक और तकनीकी परिवर्तन की दहलीज पर खड़ा है। सेमीकंडक्टर मिशन 2.0, सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, कंटेंट क्रिएटर लैब्स, पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप, मेडिकल टूरिज़्म हब और मेगा टेक्सटाइल पार्क जैसी घोषणाओं की लंबी सूची पेश की गई।
लेकिन बजट केवल घोषणाओं का दस्तावेज़ नहीं होता — इसकी असली तस्वीर आंकड़ों में छिपी होती है।
मध्यम वर्ग को टैक्स में राहत मिली या नहीं?
हर बजट में मध्यम वर्ग और टैक्सपेयर्स की सबसे बड़ी उम्मीद होती है—इनकम टैक्स में राहत। इस बार भी खपत में गिरावट और आर्थिक सुस्ती के चलते लोगों को सरकार से काफी उम्मीदें थीं।
हकीकत:
- इनकम टैक्स स्लैब और दरों में कोई बदलाव नहीं
- केवल कुछ कंप्लायंस ईज़ दी गईं
- रिवाइज़्ड रिटर्न दाखिल करने की समयसीमा 31 दिसंबर से बढ़ाकर 31 मार्च
- कुछ छोटे टैक्स अपराधों को डिक्रिमिनलाइज़ किया गया
- नया इनकम टैक्स एक्ट 2025, 1 अप्रैल 2026 से लागू होगा
दूसरी ओर, टैक्स बोझ बढ़ा भी है।
STT में बढ़ोतरी:
- फ्यूचर्स ट्रेडिंग पर टैक्स: 0.02% → 0.05%
- ऑप्शंस ट्रेडिंग पर टैक्स: 0.10% → 0.15%
इस फैसले के बाद शेयर बाजार में तेज गिरावट देखी गई। बजट भाषण खत्म होते-होते सेंसेक्स करीब 2800 अंकों तक टूट गया।
सरकार के पास पैसा कहां से आता है?
कुल बजट आकार (2026-27):
₹53.47 लाख करोड़, जो पिछले साल के ₹50.65 लाख करोड़ से 5.57% अधिक है।
राजस्व के मुख्य स्रोत:
- उधारी (Borrowing): 24%
- इनकम टैक्स: 21%
- कॉरपोरेट टैक्स: 18%
- GST और अन्य टैक्स: 15%
👉 इनकम टैक्स + GST = 36%
👉 कॉरपोरेट टैक्स = 18%
स्पष्ट है कि सरकार की आय का सबसे बड़ा बोझ व्यक्तिगत टैक्सपेयर्स पर है। पहले ऐसा नहीं था—कॉरपोरेट टैक्स का योगदान पहले कहीं ज्यादा हुआ करता था।
खर्च कहां होता है?
- सबसे बड़ा खर्च: राज्यों को टैक्स का हिस्सा
- दूसरा सबसे बड़ा खर्च: ब्याज भुगतान (Interest Payments)
- कुल बजट का करीब 20%
यानि सरकार की कमाई का पांचवां हिस्सा सिर्फ पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में चला जाता है।
शिक्षा: भाषण बड़ा, बजट छोटा
सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में कई आकर्षक घोषणाएं कीं:
- 5 यूनिवर्सिटी टाउनशिप
- STEM संस्थानों में छात्राओं के लिए हॉस्टल
- कंटेंट क्रिएटर लैब्स
- डिजाइन और एस्ट्रोफिज़िक्स से जुड़े संस्थान
वास्तविक आंकड़े:
- शिक्षा बजट: ₹1.39 ट्रिलियन
- पिछले साल से बढ़ोतरी: 8.3%
- GDP के अनुपात में खर्च: 3% से भी कम
जबकि:
- कोठारी आयोग (1964) और नई शिक्षा नीति 2020 — दोनों ने 6% GDP खर्च की सिफारिश की थी।
पिछले 10 वर्षों में करीब 90,000 सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। शिक्षक और इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी है। बजट में स्कूली शिक्षा के लिए कोई बड़ा संरचनात्मक सुधार नजर नहीं आता।
स्वास्थ्य: ज़रूरत ज्यादा, खर्च कम
- स्वास्थ्य बजट: ₹1.05 ट्रिलियन
- वृद्धि: 6.4%
WHO की सिफारिश: GDP का 5%
भारत का खर्च: लगभग 2%
प्राथमिक और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं पर यह बजट ठोस समाधान देता नहीं दिखता।
शहरी विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर
- कैपेक्स (पूंजीगत व्यय): ₹12.22 ट्रिलियन (बढ़ोतरी)
- लेकिन शहरी विकास बजट:
- पिछले साल: ₹967.77 बिलियन
- इस साल: ₹855.22 बिलियन
👉 11.6% की कटौती
पानी, सीवेज, ट्रैफिक, बाढ़ और कचरा प्रबंधन जैसी बुनियादी समस्याओं पर कोई व्यापक शहरी नवीनीकरण योजना नहीं दिखती।
बेरोज़गारी: योजनाएं बहुत, लक्ष्य नहीं
सरकार ने MSME, टेक्सटाइल, सेमीकंडक्टर, स्किलिंग और पर्यटन से जुड़ी कई योजनाएं घोषित कीं।
लेकिन:
- हर साल 1–1.2 करोड़ युवा जॉब मार्केट में आते हैं
- किसी भी योजना में ठोस जॉब टारगेट नहीं बताया गया
ये सभी उपाय लॉन्ग-टर्म हैं, जबकि बेरोज़गारी संकट तुरंत का है।
कृषि: सबसे ज्यादा निर्भरता, सबसे कम प्राथमिकता
- कृषि बजट: ₹1.63 ट्रिलियन
- बढ़ोतरी नाममात्र
MSP, खाद, खेत मजदूर, किसानों की आय जैसे मूल मुद्दों पर कोई ठोस नीति नहीं।
AI, ट्रेड वॉर और भविष्य
- सेमीकंडक्टर मिशन 2.0
- डेटा सेंटर्स के लिए विदेशी कंपनियों को 20 साल की टैक्स छूट
- AI के लिए कोई बड़ा समर्पित बजट नहीं
जबकि वैश्विक रिपोर्ट्स के अनुसार AI से 30 करोड़ से ज्यादा नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं।
निष्कर्ष
बजट 2026 में एक स्पष्ट पैटर्न दिखता है
- घोषणाएं आकर्षक
- भाषण आशावादी
- लेकिन आंकड़े सीमित
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि और शहरी विकास—हर जगह आवश्यकता ज्यादा और निवेश कम है।
पिछले बजटों की तरह इस बार भी बड़े वादे किए गए हैं, लेकिन ज़मीनी असर पर सवाल बने हुए हैं।
अब फैसला जनता को करना है—क्या यह बजट वास्तव में बदलाव लाएगा या फिर सिर्फ एक और घोषणा-पत्र बनकर रह जाएगा?
