“अगर आप भारत के कानून नहीं मान सकते, तो यहां से चले जाएँ”
आज, 3 फरवरी 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने व्हाट्सएप और उसकी पैरेंट कंपनी Meta Platforms को बेहद सख्त चेतावनी दी है। कोर्ट का मानना है कि भारतीय नागरिकों के निजता (प्राइवेसी) के अधिकार को किसी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता।
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मुख्य बातें और सुप्रीम कोर्ट का रुख
1. कानून तोड़ने पर “इंडिया छोड़ दो” वाली चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट की तीन‑न्यायाधीशों वाली बेंच, जिसकी अगुवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे हैं, ने Meta/WhatsApp को सीधी चेतावनी दी कि अगर वे भारतीय कानूनों, संविधान और नागरिकों के निजता अधिकार का पालन नहीं कर सकते, तो उन्हें भारत से बाहर चले जाना चाहिए।
2. प्राइवेसी अधिकार से कोई समझौता नहीं
कोर्ट ने कहा कि डेटा प्राइवेसी केवल एक तकनीकी मसला नहीं है, बल्कि संवैधानिक अधिकार है।
इसलिए किसी भी कंपनी को, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, नागरिकों के निजी डेटा को अपनी व्यावसायिक या विज्ञापन‑आधारित उपयोग के लिए साझा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
3. “वास्तविक सहमति” (informed consent) पर सवाल
कोर्ट ने Meta/WhatsApp के उन दावों को भी नकार दिया कि उपयोगकर्ताओं को प्राइवेसी पॉलिसी का “विकल्प” चुनने का पूरा अधिकार है।
न्यायालय ने कहा कि उस तरह की पॉलिसी आम व्यक्ति — खासकर ग्रामीण भारतीय, बुज़ुर्ग या कम पढ़े‑लिखे लोग — के लिए समझना ही मुश्किल है, इसलिए वह सच‑मुच में विकल्प नहीं मानती।
मामला किस बारे में है?
यह कानूनी लड़ाई WhatsApp की 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर है। उस पॉलिसी में उपयोगकर्ताओं को एक ऐसा “सभी‑या‑कुछ नहीं” विकल्प दिया गया था, जिसमें अगर वे Meta के साथ उनका डेटा साझा करने से इनकार करते तो उन्हें सेवा का उपयोग जारी रखने की अनुमति नहीं मिलती थी — यानी या तो डेटा शेयर करो या ऐप छोड़ दो।
इसका प्रभाव
- डेटा को विज्ञापन और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था।
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह नागरिकों के निजता के अधिकार का उल्लंघन है और ऐसे डेटा उपयोग को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कोर्ट ने क्या आदेश दिए?
डेटा साझा नहीं करने का स्पष्ट निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने Meta और WhatsApp को साफ निर्देश दिया कि वह किसी भी भारतीय यूज़र का डेटा Meta के साथ साझा नहीं करेंगे — खासकर विज्ञापन या व्यावसायिक लाभ के लिए।
आदेश में यह भी कहा गया कि अगर Meta एक स्पष्ट लिखित undertaking (जवाब) नहीं देगा कि वे डेटा साझा नहीं करेंगे, तो कोर्ट उनका मामला खारिज भी कर सकता है।
प्राइवेसी पॉलिसी की भाषा पर आलोचना
न्यायालय ने Meta की पॉलिसी की भाषा को “अत्यंत जटिल” और “सामान्य उपयोगकर्ता के समझ से परे” बताया — जिससे असल में लोगों के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि वे क्या स्वीकार कर रहे हैं।
भुगतान या विज्ञापन के लिए डेटा? नहीं चलेगा
कोर्ट ने यह भी ज़ोर देकर कहा कि केवल “व्यावसायिक कारण” या “लक्षित विज्ञापन” के लिए किसी के निजी डेटा का इस्तेमाल करना भारत में स्वीकार्य नहीं होगा।
विशेषज्ञों का कहना
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में Solicitor General (मुख्य सरकारी वकील) ने यह भी कहा कि आजकल डेटा एक अत्यंत मूल्यवान संपत्ति बन चुका है, और अगर इसे विनियमित नहीं किया जाएगा तो नागरिकों की निजता और सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है।
अब क्या होगा?
- अदालत ने इस मामले में आगे की विश्लेषणात्मक और विस्तृत सुनवाई 10 फरवरी 2026 के लिए सूचीबद्ध की है।
- इस दौरान Meta, WhatsApp, और सरकार को डेटा संरक्षण कानूनों, व्यवहारिक डेटा अनुचित उपयोग, और डिजिटल निजता कानून की पालना पर विस्तृत जवाब देने होंगे।
सारांश (बहुत सुव्यवस्थित तरीके से)
✔ सुप्रीम कोर्ट ने Meta/WhatsApp को कड़ी चेतावनी दी।
✔ कहा कि भारतीय नागरिकों की निजता सर्वोपरि है।
✔ डेटा को विज्ञापन या व्यावसायिक लाभ के लिए साझा करना बर्दाश्त नहीं होगा।
✔ कंपनी को भारतीय कानूनों की पालना करना अनिवार्य है — वरना भारत छोड़ देना होगा।
✔ अदालत ने पॉलिसी की भाषा और उपयोगकर्ताओं का विकल्प स्पष्ट नहीं होने पर सवाल उठाए।
✔ आगे की सुनवाई और निर्णय 10 फरवरी 2026 को होगा।

